श्री दीक्षित ने कहा-"आज के छात्र-छात्राएं भी निरंतर कठोर अभ्यास, अध्ययन-मनन, अनुशीलन को अपने स्वभाव में ढाल लें तो विद्यार्थी और मानव जीवन की कठिन से कठिन चुनौतियों पर भी आसानी से विजय प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने चेताया कि लॉर्ड मैकाले द्वारा पुष्पित-पल्लवित आज की शिक्षा भारत की आजादी के 78 वर्ष बाद भी अपने धर्म-संस्कृति, भाषा और सद्संस्कारों की मूल जड़ों से लगभग कट चुके बेजान ब्यूरोक्रेटेस की अंधी फौज ही तैयार कर रही है। अगर हमें नई पीढ़ी को अपने राष्ट्र-समाज, भाषा और संस्कृति का सच्चा संरक्षक बनाना है तो अपनी शिक्षा प्रणाली को कौशल-रोजगारपरक और प्रासंगिक बनाने के साथ ही उसे धर्म, संस्कृति, राष्ट्र प्रेम, परोपकार, सेवाभाव, सर्वकल्याण और सद्संस्कारों जैसे सद्गुणों के अमृत जल से पोषित-पल्लवित करना ही पड़ेगा।"